सरदार पटेल की भूमिका (Sardar Patel ke Bhoomika)

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सरदार पटेल की भूमिका (Sardar Patel ke Bhoomika)

पटेल ने बहुत सारी,दावतों का आयोजन जहां उन्होंने राजघराने के मेहमानों से अनुरोध किया कि वे भारत के नए संविधान बनाने में
कांग्रेस की मदद करें।

पटेल का पहला कदम उन रियासतों से अपील करना था जिनके क्षेत्र भारतीय क्षेत्रो के अंदर आते हैं, जिससे उनके तीन विषयों अर्थात्‌ विदेशी संबंधों, रक्षा और संचार को भारतीय संघ में सम्मिलित किया जा सके, क्योंकि इनसे देश के समान्य हित प्रभावित होते हैं।

उन्होंने, 45 अगस्त, 947 , के बाद व्याकुल और अधीर लोगों को, उनके द्वारा ना रोक पाने के खतरे की आशंका भी जतायी। राज्यों को अराजकता और अव्यवस्था के निहित खतरों के विषय मैं एक अपील जारी की गई थी।

महान कौशल और कुशल कूटनीति के साथ अनुनय और दबाव दोनों का उपयोग करते हुए, सरदार पटेल ने सैकड़ों रियासतों को एकीकृत करने में सफलता हासिल की। कुछ रियासतें संविधान सभा में देशभक्ति, ज्ञान और यथार्थवाद, के साथ शामिल हुई, लेकिन कुछ रियासतें अभी भी इसमें शामिल होने के पक्ष नहीं थीं।

पटेल का अगला कदम माउंटबैटन को इस काम के लिए राजी करना था। माउंटबेटन के चैंबर ऑफ प्रिंसेस के 25 जुलाई के भाषण में
आखिरकार रियासतों को मना लिया

इस भाषण को भारत में माउंटबैटन के सबसे महत्वपूर्ण कृत्य के रूप में स्थान दिया गया। इसके बाद , तीन रियासत को छोड़कर लगभग सभी राज्यों ने “विलय के प्रारूप” (इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेशन) पर हस्ताक्षर किए।

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