गांधी जी का राष्ट्रवाद – (Full Explanation) Gandhi Ji And Nationalism In Hindi

गांधी जी का राष्ट्रवाद

Gandhi Ji And Nationalism In Hindi

गांधी जी का राष्ट्रवाद Gandhi Ji And Nationalism In Hindi

गांधीवादी दृष्टिकोण – Gandhian view in Gandhi ji nationalism

गांधी ने राष्ट्रवाद को अलग ढंग से प्रस्तुत किया । गांधी ने राष्ट्र को प्रजा से जोड़ा । गांधी के राष्ट्रवाद को उनके चिंतन से अलग नहींकिया जा सकता । दूसरे शब्दों में गांधी ने राष्ट्रवाद पर अलग से अपना कोई विचार प्रस्तुत नहीं किया ।

गांधी के विचारों में राष्ट्रवाद को समझने के लिए उनकी विचारधारा और सम्पूर्ण दर्शन का अध्ययन करना जरूरी है । उनके लिए राष्ट्रवाद भारत की आजादी हेतु निहित संघर्षों में समाहित था ।

उनके विचारों को इस विषय को लेकर समझने के लिए इन दो चीजों पर गौर करना होगा कि गांधी के हृदय में राष्ट्रवाद नामक पौधा का प्रस्फुटन भारत में नहीं बल्कि दक्षिण अफ्रिका (South Africa) में हुआ । और तथ्य अकेले ही अन्य भारतीय राष्ट्रवादियों से अलग करती हैं ।

दूसरा , चम्पारण या बारदोली के बजाय ट्रांसवाल की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर गांधी ने अपने अद्भुत व अनुरपम राजनीतिक दर्शन , तौर तरीकों का विकास किया । गांधी ने कहीं एक जगह राष्ट्रवाद के बारे में कोई ठोस विचार नहीं दिया है , इसलिए गांधी के दृष्टिकोण में राष्ट्रवाद को समझने के लिए सम्पूर्ण गांधी साहित्य का अध्ययन करना जरूरी है। 

गांधी के रचनाक्रमों के अध्ययन के फलस्वरूप कुछ तथ्य उभरकर सामने आये हैं

1. गांधी जी का राष्ट्रवाद –  Gandhi Ji And Nationalism In Hindi

गांधी का राष्ट्रवाद ‘ समायोजन ‘ पर आधारित था , जिसमें भारत के विभिन्न समुदायों का राष्ट्रीय समरसता कायम करना शामिल था । ” उनकी राष्ट्रवादी अवधारणा में न केवल धार्मक समूह बल्कि जातियां और प्रजातियां भी शामिल थीं ।

इस पर रविन्द्र कुमार ने टिप्पणी की है कि चूंकी गांधी के मानस में भारत की वास्तविक तस्वीर वर्गों , जातियों , समुदायों तथा धार्मिक समूह के एक स्वच्छंद घनीभूत के रूप में थी , जो वे इस उपमहादवीप के जनमानस में राष्ट्रीय भावना भरने में जितना समर्थ थे उतना इनके पूर्व न कोई था और न बाद में हुआ ।

‘ ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने के अपने कार्यक्रम में वे सभी जातियों , वर्गों , समुदायों , धर्मालंबियों को एक मंच पर लाये तथा अपने साझे राष्ट्रवाद की भावना से प्रेरित कर लक्ष्य को प्राप्ति के लिए प्रेरित किया ।

यह काम उन्होंने सारे समूहों को साथ लेकर किया । साथ ही उनका प्रयास था कि विभिन्न मत भिन्नताओं और विभिन्न विचारों वालों को भी जागृत कर एक मंच पर लाया जाये ।

2. गांधी जी का राष्ट्रवाद औपनिवेशिक सत्ता से प्रेरित था –  Gandhi Ji And Nationalism In Hindi

गांधी का राष्ट्रवाद औपनिवेशिक सत्ता से प्रेरित था लेकिन उनके तौर – तरीके यूरोपीय देशों से कई मायनों में अलग थे । उन्होंने वैसे राष्ट्रवाद को दरकिनार कर दिया जो हिंसा पर आधारित हो जैसा कि यूरोपीय देशों में देखने को मिलता है ।

वे अपने उद्धेश्य को प्राप्त करने के लिए अहिंसा का उपयोग करना चाहते थे , उनका मानना था कि ‘ प्रेम या आत्मा की ताकत के आगे हथियारों की तातक निरीह व निष्प्रभावी । उनका मानना था कि हिंसा से आपसी संवाद खत्म होते हैं और समाज में हिंसक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है ।

उनका विचार था कि भारतीयों को ब्रिटिश सरकार की गलतियों का एहसास दिलाना चाहिए तथा सत्याग्रह दवारा अपने आप को बदलने का प्रयास करना चाहिए । उनकी नजरों में राष्ट्र की मुक्ति के लिए हिंसा का कोई स्थान न था ।

3. गांधी जी का राष्ट्रवाद बिना किसी भेदभाव था – Gandhiji’s nationalism was without any discrimination

उनका राष्ट्रवाद समाज के सभी तबकों के साथ बिना किसी भेदभाव के सामूहिक सोच व लक्ष्य की अभिव्यक्ति थी । वे जाति या वर्ग के आधार पर पृथकतावादी दृष्टिकोण के खिलाफ थे ।

उन्होंने जातीय ऊंच – नीच के खिलाफ हमेशा आवाज उठायी और भारत से छुआछूत मिटाने का अथक व गंभीर प्रयास किया । वे हमेशा से एक ऐसे राष्ट्रवाद पक्षधर थे जो विभिन्न वर्गों – समुदायों तथा बहुलतावादी संस्कृति पर आधारित हो । भारत से छुआछूत को हटाने के लिए उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में काफी परिवर्तन किये । दक्षिण अफ्रीका में गांधी सहयोगियों में सबी जातियों व सामुदाय के लोग शामिल थे ।

1915 में भारत लौटने पर अहमदाबाद में स्थापित पहले आश्रम में उन्होंने लाख विरोध के बावजूद अछूत व्यापारियों को आमंत्रित किया । उन्होंने अछूतों को ‘ हरिजन ‘ नाम दिया और फिर सी मान से उन्होंने साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन भी किया । यह पत्रिका समाज में निचले तबकों की समस्याओं पर केन्द्रित थी ।

1932 में जेल से छूटने के बाद छुआछूत को मिटाने के लिए उन्होंने 12,500 मील की पैदल यात्रा की । उन्होंने इस उद्धेश्य को पूरा करने के लिए ‘ हरिजन कोष ‘ की स्थापना की । गांधी का मानना था कि ब्रिटिश सरकार इसी जात – पात के आधार पर लोगों को बांटकर शोषण कर रही है ।

जैसा कि 1909 के एक्ट से हिंदु – मुस्लिम के बीच खाई पैदा की थी । अत : भारत की एकता और अखंडता को रखने के लिए गांधी ने ब्रिटिश सरकार के सारे कपटपूर्ण नीतियों को कमजोर करने की कोशिश की जिससे भारतीय रा , ट्रवाद कमजोर हो सकता था ।

 

4.गांधी का राष्ट्रवाद धर्म के साथ साथ पंथनिपेक्ष प्रकृति वाला था

गांधी का राष्ट्रवाद धर्म से प्रेरित होने के बावजूद पंथनिपेक्ष प्रकृति वाला था । यद्दापि गांधी की नजरों में भारत विभिन्न धर्मों , भाषाओं , पंथों तथा जातियों का देश था । फिर भी जब कभी भी संशेलेषण विश्लेषण व पारस्परिक अस्तित्व की बात आयी तो अनजाने ही वे हिंदुत्व की तरफ झुके नजर आये ।

गांधी दवारा बार – बार धर्म की बात करने से उनके विचारों में थोड़ी अस्पष्टता और उलझन दिखाई देती है । धर्म के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत ही व्यापक था , वे धर्म में मिले तमाम रूढ़ियों , रिवाजों और अंधविश्वासों को तोड़ना चाहते थे ।

वे धर्म को व्यक्तिगत मानतेथे जहां लोग अपने दैनिक जीवन के क्रियाकलापों की शुद्धता पर ध्यान देता तो । इसी प्रकार राष्ट्र के संदर्भ में भी उनकी प्रवृति धर्मनिरपेक्ष थी । गांधी के धार्मिक विचारों के संदर्भ में विदवानों ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किये ।

एम.एन. राय प्रारंभ में गांधी दवारा ‘ राजनीतिक व धर्म के घालमेल ‘ के कट्टर आलोचक थे लेकिन बाद में उन्होंने समझा कि गांधी के धार्मिक विचारों की जड़ नैतिक , मानवतावादी तता वैश्विक थी तथा उनमें किसी व्यक्ति , पंथ , धर्म , समाज , या राष्ट्र के पआति उनके मन में लेशमात्र भी दुराग्रह नहीं था ।

गांधी दवारा हिंद स्वराज लिखे जाने के समय यह बात बहस का मुद्दा थी कि भारत की राष्ट्र के रूप में स्थापना धार्मिक आधार पर संभव है या नहीं । इस किताब में उन्होंने राष्ट्र शब्द के लिए प्रजा शब्द का इस्तेमाल किया । उनका विश्वास था कि प्रजा नीमक शब्द से भारत में एक साझे संस्कृति का निर्माण होगा ।

उन्होंने हिंद स्वराज में ‘ प्रजा ‘ पर आधारित उदार राष्ट्रवाद को अपनाने पर बल दिया । उन्होंने लोगों का आव्हान किया और धर्म को धर्माधता की बुराई से मुक्त कराने और प्रेम तथा आध्यात्म पर आधारित धर्म पर जोर दिया तथा उन्होंने बताया कि प्रेम तथा आध्यात्म धर्म की रास्ता सुगम व आसान होता है । इस प्रकार उन्होंने कहा कि सभी संगठित धर्म की अपनी वाधता होती है ।

इसका मतलब यह है कि सभी धर्मों को एक – दूसरे के प्रति सहनशीलता व सम्मान अपनाना चाहिए । यद्दापि गांधी का झुकाव हिंदुत्व के प्रति था , पर उनका दृष्टिकोण बहुत ही व्यापक था । इसमें की  शक नहीं कि गांधी धर्म – निरपेक्ष तथा धार्मिक आदर्शों के प्रति समर्पित ही नहीं बल्कि इसको अपनाने में अग्रदूत की भूमिका निभाई ।

वे साम्प्रदायिक मतबेदों को आपसी मेल – जोल के साथ हल करना चाहते थे , जिसमें समुदायों की भागीदारी अनिवार्य थी । वे एक ऐसे राष्ट्रवाद का निर्माण करना चाहते थे जिसकी बुनियाद सद्भावना , सहअस्तित्व तथा समन्वय पर आधारित थी न कि समावेशीकरण , सम्मिश्रण तथा संयोजन पर ।

कुछ विदवानों का मत यहां तक है कि अंतिम दिनों में उनका धार्मिक बहुलतावाद की सीमा ‘ बहुल ‘ हिंदुत्व से आगे जाकर बहुधर्मी तानों – बानों में गुंथ गई थी तथा उनके धार्मिक विचारों व दर्शन का स्वरूप पूर्णत : वैश्विक हो गया था ।

5.गांधीवादी राष्ट्रवाद में अंतर्राष्ट्रीयतावादी पुट था

उनका मानना था कि दोनों का सह – अस्तित्व मुमकिन है । इसका कारण था कि वे राज्य व राष्ट्र को एक – दूसरे से पृथक मानते थे । उनके अनुसार राष्ट्र ऐसे व्यक्तियों का आर्थपूर्ण सम्मिलित स्वरूप है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपनी अंत : शक्तियों से परिचालित होकर एक साझे लक्ष्य को पाने के लिए प्रयत्नशील रहता है ।

पर राज्य एक मशीनी व्यवस्था है जो राष्ट्र पर थोप दी जाती है । गांधी की नजरों में राष्ट्र रचनात्मकता और जीवंतता का एक रूप है तो राज्य रूढियों और परंपराओं का एक आदर्श रूप ।

” गांधी इस बात को सुनिश्चित करना चाहते थे कि राष्ट्र के सामाजिक सरोकारों पर राज्य के काले बादल न छा जाएं । वे इस बात से डरते थे कि राष्ट्र का भाग्य तथाकथित नियंत्रक के रूप में राज्य दवारा निष्क्रिय न कर दिया जाए ।

यद्दापि गांधी ने जिन्ना जैसे प्रतिक्रियावादियों दवारा बाध्य किये जाने के अपवाद के अलावा ‘ राष्ट्र ‘ शब्द का इस्तेमाल विरले ही किया । यहां पर उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया कि भारत सिर्फ कुछ समुदायों का बहुरंगा समूह नहीं वरन् यह एक ऐसा राष्ट्र है जहां लोगों की आकांक्षाएं व आशाएं साझे हित से प्रेरित हैं तथा जिसकी प्रताबद्धता एक आध्यात्मिक सभ्यता की खोज व निर्माण की विकास है ।

इस संदर्भ में ‘ भीखू पारिख ‘ का कथन उल्लेखनीय है कि उन्होंने राष्ट्रवाद शब्द का प्रयोग देश प्रेम के रूप में किया । अधिकार जगहों पर उन्होंने सामूहिक गौरव , पैतृक निष्ठा , पारस्परिक उत्तरदायित्व तथा बौद्धिक व नैतिक खुलेपन को अधिक बेहतर व अनुकूल माना । अत : राष्ट्रवाद के विचार को अंतर्राष्ट्रीयवाद के पूरक के रूप में समजा जा सकता है ।

जैसे कि उन्होंने खुद कहा किसी के लिए यह असम्बव हा कि वह राष्ट्रवादी बने बिना अंतर्राष्ट्रीयवादी बन जाए । अंर्तराष्ट्रीयवाद तभी संभव है जब राष्ट्रवाद की अनुभूति कर ली जाये । राष्ट्रवाद के संकीर्णता , स्वार्थपरता तथा विशिष्टता के , चश्मे से देखना पाप है तथा आधुनिक राष्ट्रवाद की अवधारणा पर यह कलंक है ।

आदुनिकता की इस चकाचौंध में प्रत्येक व्यक्ति एक – दूसरे को पछाड़कर या गिराकर आगे बढ़ना चाहता है । यह अपने आपको इस ढंग से परिपूर्ण करना चाहता है जो सम्पूर्ण मानवता के पक्ष में खड़ा हो सके ।

6.गांधी समुदायवादी रुख के अलावा बहुलता व सम्मिश्रण सरोकारों में अधिक विश्वास रखते थे

यह बात उस समय और अधिक स्पष्ट हुई जब जिन्ना ने मुस्लिम साम्प्रदायिकता के आधार पर अलग राष्ट्र की मांग की तो इस पर गाधी का विचार था कि यूरोपीय राष्ट्रों की तरह भारत की राष्ट्रीयता को परिभाषित करना उचित नहीं है ।

वे भारत को एक ऐसी सभ्यता का देश मानते थे जहां विभिन्न सम्प्रदाय , जाति व समुदाय के लोग आपसी समझ व सहनशीलता के साथ वर्षों से रहते आ रहे हैं । यह समुदायों का एक ऐसा समुदाय है जहां प्रत्येक अपने कर्म , विचार व दर्शन के लिए स्वतंत्र है पर प्रत्येक का भाग्य एक साझे संस्कृति पर आधारित है ।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय मुस्लिम सिर्फ क्षेत्रीय दायरे में ही भारतीय नहीं हैं , बल्कि सांस्कृतिक यह वही समय था जब कांग्रेस पर गांधी की पकड़ मजबूत थी इसलिए इस समय कांग्रेस के सभी प्रयासों में गांधीवादी विचारधारा की प्रमुख व निर्णायक भूमिका थी ।

कांग्रेस के सभी कार्यक्रम ‘ व्यावहारिकता व अध्यात्मिकता पर आधारित थे । इस परिप्रेक्ष्य में विपिन चन्द्र का यह कथन उल्लेखनीय है कि उपनिवेश विरोधी विचारधारा के साथ – साथ स्वतंत्रता , समानता , लोकतंत्र , धर्मनिरपेक्षता , सामाजिकता , आर्थिक विकास , स्वतंत्र व संयुक्त राजनीति तथा गरीबोन्मुखी विचारों की प्रेरणा ने कांग्रेस की दशा व दिशा बदल दी तथा वह इस बात में सक्षम व समर्थ हुई कि वह राष्ट्रीय आंदोलन को लोकप्रिय जन आंदोलन का रूप प्रदान कर सके ।

यद्यपि गांधी इस बात को भलीभांति जानते थे कि इस तरह के आंदोलन का भविष्य लंबा नहीं है तथा उसे लंबे समय तक जारी नहीं रखा जा सकता । सो बीच – ची में उन्होंने विराम की नीति अपनाई जो आगे के आंदोलनों में इस नीति ने ऊर्जा भरने का काम किया । इस तरह गांधी ने संघर्ष विराम – संघर्ष की नीति को अपना हथियार बनाया ताकि आंदोलन को लंबे समय तक कायम रखा जा सके ।

इस आंदोलन को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने के लिए गांधी ने रचनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से तेरह बिन्दुओं को तय किया । ” इन रूप से भी वे पूर्णत : भारतीय हैं तथा हिन्दुओं के साथ – साथ वे भारतीय सभ्यता के साझे के भागीदारी हैं । यद्यपि अन्य समुदायों की तरह उनका अपने विशिष्ट रीति – रिवाज हो सकते हैं ।

पर वे राष्ट्र के भीतर किसी तरह से शांति या सहअस्तित्व में बाधक नहीं हैं । उनकी नजर में भारत ही एक ऐसी हस्ती थी जिसकी सामाजिक व सांस्कृतिक विशिष्टताएं पूरे भारत में एक समान थी । सो विभिन्न समुदायों के बजाय सभ्यता की बात करते हुए गांधी ने एक ऐसे भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण की कोशिश की जिसकी बुनियाद बहुलता तथा समरसता पर आधारित हो जो विविधताओं व विभिन्नताओं का न केवल सम्मान करता हो बल्कि उसके प्रति उत्साह , उमंग और जीवंतता भी रखता हो ।

वे एक ऐसे वातावरण की रचना करना चाहते थे जहां संस्कृतियों व समुदायों में आपसी मेल – जोल हो । इस प्रकार गांधी का राष्ट्रवाद मानवतावाद पर आधारित था । चूंकि गांधी समुदाय को व्यक्तियों का समूह मानते थे , सो उनकी नजर में आपसी झगड़ों पर निपटारा उसी तरह होना चाहिए जैसे परिवार के सदस्यों के बीच होता है ।

7. राष्ट्रवाद का उनका सिद्धांत जन आधारित था

यही कारण रहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के आगमन के बाद एक नवीन किस्म के राष्ट्रवाद का जन्म हुआ। गांधी के आगमन ने राष्ट्रवादी आंदोलन को एक नई दिशा व दृष्टि दी इससे आंदोलन का स्वरूप बहुजन व बहु वर्ग आधारित हो गया । अपने देशी गतिविधियों के कारण इसने एक अलग पहचान बनाई ।

गांधी युग के पूर्व सामाजिक स्तर पर राजनीतिक जागरण कुछ चंद ऊंचे तबकों तक ही सीमित नहीं था बल्कि निजी हित साधने का एक जरिया भी बन चुका था ।

औपनिवेशिक शासन के लिए यह परिस्थिति अनुकूल थी । इसका परिणाम यह हुआ कि समाज वर्गों के आधार पर बंटता चला गया और दूसरी ओर साम्प्रदायिक विभाजन भी इसी का परिणाम था । लेकिन गांधी ने चंपारण , खेडा , बारदोली जैसे दूर – दराज क्षेत्रों में अपना प्रयोग कर आंदोलन को लोगों से जोड़ा और देशव्यापी जन आंदोलन जैसे असहयोग , खिलाफत , सविनय अवज्ञा आंदोलन से लोगों को जोड़ा ।

भारत छोड़ो जैसे अत्यंत प्रभावी आंदोलनों के द्वारा देश के कोने – कोने में हर वर्ग और समुदायों के बीच अपनी बात पहुंचाई तथा साझे लक्ष्य से प्रेरित कर राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की और इस तरह प्रथम विश्वयुद्ध के समय तक जो आंदोलन कुछ खास लोगों तक सीमित था । उसने हिंदुस्तान के जनमानस को आंदोलित , स्पंदित व सक्रिय कर दिया ।

टनदेव कार्यक्रमों में शामिल थे साम्प्रदायिक एकता , छूआछूत , उन्मूलन , मद्यनिषेध , शिक्षा , महिला सशक्तीकरण , स्वास्थ्य व सफाई , राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम तथा ट्रस्टीशिप के द्वारा आर्थिक समानता का प्रचार – प्रसार ।

लेकिन सलीनियस का यह मत है कि उपरोक्त कार्यक्रमों में केवल तीन हिन्दू – मुस्लिम एकता , छुआछूत उन्मूलन तथा खादी कार्यक्रम को व्यापक जनसमर्थन मिला । खिलाफत आंदोलन के समय गांधी के प्रयासों से ही हिन्दू – मुस्लिम एकता परवान चढ़ी ।

खादी कार्यक्रम और छुआछूत कार्यकम मिशन के तौर पर चलाया गया । यद्यपि हिन्दू – मुस्लिम एकता को देश विभाजन से पूर्व भारतीय स्वतंत्रता के अंतिम दिनों में फिर से जिंदा किया गया । लेकिन सवाल उठता है कि क्या गांधी ने इसे जनआंदोलन का रूप दिया । इस पर विवाद है ।

लेकिन एक बात स्पष्ट है कि राष्ट्रवादी संघर्ष का अंतिम काल गांधीवादी विचारधारा की गिरफ्त में था ।

Conclusion of Gandhi Ji nationalism – गांधी जी के राष्ट्रबाद का निष्कर्ष

गांधीवादी राष्ट्रवाद एक व्यापक फलक का राष्ट्रवाद था जो संकुचति वा सांप्रदायिक दृष्टि से परे और सभी जातियों , दबे – कुचले व समाज के पिछड़े तबको को एक समान धरातल पर लाने की बात करता है । यह राष्ट्रवाद सामाजिक और आर्थिक खाइयों को पाटना चाहता था । धर्म – निरपेक्षता के प्रति उनके विचार पर विवाद की संभावना है ।