वेश्यावृत्ति के कारण , दुष्प्रभाव | Disadvantages and Cause of Prostitution in hindi

बाल श्रम या ब...

वेश्यावृत्ति के कारण , दुष्प्रभाव | Disadvantages and Cause of Prostitution in hindi

वेश्यावृत्तियों के कारण

वेश्यावृत्ति के कारकों को दो मुख्य श्रेणियों में रखा जा सकता है

  1.  वैयक्तिक या आंतरिक कारक
  2.  अवैयक्तिक या बाह्म कारक।

इन दोनों मुख्य श्रेणियों में प्रत्येक के अंतर्गत कई विशिष्ट कारक होते हैं।

साधारणतः, इन सभी कारको को वेश्याओं की माँग और आपूर्ति दोनों से प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध होता है। इन कारको की विवेचना करने के पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि ये एक-दूसरे से संबद्ध और एक दूसरे पर आश्रित रहते हैं और उनका प्रभाव सम्मिलित रूप से पड़ता रहता है।

वेश्यावृत्ति के संबंध में, फ्लेक्सनर के इस कथन में सत्य की मात्रा अधिक है- “कोई भी एक परिस्थिति अकेले घातक नहीं होती। प्रभावों और संबंधों के जटिल लच्छे को पूरी तरह सुलझाया नहीं जा सकता।

1. वेश्यावृत्ति के व्यक्तिगत या आंतरिक कारक – Disadvantages and Cause of Prostitution in hindi

वेश्यावृत्ति के व्यक्तिगत या आंतरिक कारकों में निम्नलिखित मुख्य है 

यौन अनुभव की इच्छा तथा असामान्य कामुकता –

यौन अनुभव की इच्छा तथा असामान्य कामुकता वेश्यावृत्ति की माँग और पूर्ति दोनों पक्षों को प्रभावित करती है। कई स्त्रियों में यौन अनुभव की तीव्र इच्छा होती है।

समय पर विवाह नहीं होने, पति से दूर रहने, विधवा से जाने, तलाक कर दिए जाने तथा कई अन्य कारणों से उनकी यह इच्छा समाज द्वारा स्वीकृत तरीके से पूरी नहीं हो पाती। अतः वे यौन-तृप्ति के लिए अनैतिकता का सहारा लेती है और उनमें कई वेश्यावृत्ति अपना लेती है।

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मानसिक दुर्बलता एवं अज्ञानता 

कई लड़कियों और स्त्रियाँ अपनी मानसिक दुर्बलता और अज्ञानता के कारण अच्छे-बुरे. उचित-अनुचित. पाप-पुण्य आदि के बीच अंतर को पहचानने में असमर्थ होती है।

वे सहजता से असामाजिक तत्वों, जैस-गुंडों, बदमाशों, दलालों आदि के चंगुल में फँस जाती है। ये असामाजिक तत्व उनका तरह-तरह से शोषण करते हैं और कई को वेश्यालयों में पहुँचाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं।

विलासप्रियता – कई लड़कियों और स्त्रियों में विलासिता से पूर्ण जीवन व्यतीत करने की प्रबल इच्छा होती है। वे नए फैशन, अच्छे

मकान, कार, कम्प्यूटर, इलेक्ट्रानिक सामान आदि आधुनिक सुख-साधनों की ओर भागती रहती है। इन सुख-साधनों के निरंतर विस्तार से इनके प्रति प्रलोभन के अवसर भी बढ़े है।

कम आमदनीवाले परिवारों में उनके विलासपूर्ण जीवन की इच्छा पूरी नहीं हो पाती। विलासिता और आराम के जीवन व्यतीत करने के लोभ में कई लड़कियों और स्त्रियाँ अनुचित और अवैध यौन संबंधों के माध्यम से धन कमाने लगती है।

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आलस्य एवं उपाय-कुशलता का अभाव

आलस्य और उपाय-कुशलता का अभाव वेश्यावृत्ति में माँग और पूर्ति दोनों पक्षों को प्रभावित करते हैं। आलस्य के कारण कई पुरुषों और स्त्रियों का शारीरिक और मानसिक विकास समुचित रूप से नहीं हो पाता। ऐसे व्यक्तियों के लिए उपयोगी जीवन व्यतीत करना तथा आत्मनिर्भर होना बहुत कठिन होता है।

अनेक आलसी पुरूष अपने मंद जीवन से राहत पाने के लिए वेश्याओं के पास जाते रहते हैं। दूसरी ओर, कई लड़कियाँ और स्त्रियाँ अपने आलस्य एवं नीरसता से पूर्ण जीवन में आनंद के लिए अनुचित यौन-संबंधों का सहारा लेती है और धीरे-धीरे पतन की ओर अग्रसर हो जाती है।

2. वेश्यावृत्ति के अवैयक्तिक या बाह्य कारक – Disadvantages and Cause of Prostitution in hindi

वेश्यावृत्ति में अवैयक्तिक या बाह्म कारक अत्यंत ही महत्वपूर्ण होते है। वास्तव में, व्यक्तियों के आचरण पर इन कारकों का गहरा प्रभाव पड़ता रहता है। व्यापारिक वेश्यावृत्ति में तो ये कारक और भी शक्तिशाली होते हैं। इन बाह्य कारकों को भी वेश्यावृत्ति की माँग और पूर्ति दोनों पक्षों पर प्रभाव पड़ता है।

यही कारण है कि वेश्यावृत्ति के नियंत्रण के लिए पर्यावरण में सुधार को भी अति आवश्यक बताया जाता है। वेश्यावृत्ति के कुछ महत्वपूर्ण अवैयक्तिक या बाह्य कारक निम्नलिखित है – 

निर्धनता एवं आर्थिक परनिर्भरता 

कई अध्ययनों और सर्वेक्षणों दिखाया गया है किवेश्यालयों में रहने वाले अधिकांश वेश्याएं निर्धन परिवारों से आई है। लौड्रेस – ‘भूख’ को वेश्यावृत्ति की आधारशिला मानते हैं।

वेश्यावृत्ति का इतिहास बताता है कि अभावों ग्रस्त अनेक लड़कियों और स्त्रियों को केवल अपने और अपने बाल-बच्चों के पेट भरने के लिए ही अनैतिक पतन और अग्रसर होना पड़ा है। अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पिता द्वारा पुत्री को, पति द्वारा पत्नी तथा संबंधियों द्वारा संबंधी लड़कियों को वेश्यावृत्ति से धन कमाने के लिए बाध्य किए जाने के अनेक उदाहरण लेते है।

आर्थिक असमानता

जहाँ आर्थिक विषमताएँ व्यापक से फैली होती है, वहाँ वेश्यावृत्ति की संभावना भी अधिक होती है। साधारणतः, ऐसा देखा जाता है कि जिन जनसमूहों या जनसंख्या के बड़े में निर्धनता व्याप्त रहती है, उनमें अपने ही सदस्यों के संरक्षण में वेश्यावृत्ति की समस्या नहीं के बराबर होती है।

संपन्न व्यक्ति ही इन निर्धन लड़कियों और स्त्रियों की आर्थिक दयनीयता का लाभ उठाकर उन्हें वेश्यावृत्ति की ओर जाते हैं।

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यौन-संबंधों के कठोर एवं दोहरे मानक

प्रायः देखा जाता है कि जिन समाजों में यौन सम्बन्धी मानक अधिक कठोर होते हैं, उनमें यौन सम्बन्धों के नियमों के उल्लंघन करने वालों के साथ सख्ती का बरताव किया जाता है। साधारणतः, ऐसे नियम लड़कियों और स्त्रियों के लिए अधिक कठोर होते हैं।

उनके उल्लंघन के लिए लड़कियों को घर से निकाल देने, शारीरिक ताड़नाएँ देने, बहिष्कृत करने आदि के अनेक उदाहरण मिलते हैं। समाज ऐसी लड़कियों और स्त्रियों को स्वीकार नहीं करता।

उनके साथ विवाह और सामाजिक समायोजन की समस्या सदा बनी रहती है। इनमें कई लड़कियाँ असामाजिक तत्वों के चंगुल में फँस जाती है जो उनका तरह-तरह से शोषण करने लगते हैं। अगर ऐसी लड़कियों की भूल पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता, तो इसमें कई वेश्यावृत्ति से बच जाती।

पारिवारिक दशाएँ

परंपरा से ही यौन-संबंधी आचरण को विनियोजित एवं नियंत्रित करने में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परिवार यह कार्य समुचित ढंग से तभी कर सकता है, ज बवह सुव्यवस्थित, समेकित और विघटनरहित हो।

लेकिन, कई आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक तथा अन्य कारणों से अनेक परिवारों में विघटन के तत्व आ जाते हैं, ऐसे टूटे हुए परिवारों में तलाक, कलह, तनावपूर्ण संबंध, स्वेच्छाचारिता, नशीले पदार्थों का सेवन आदि आम बाते हो जाती है। अभिभावकों की सुरक्षा के अभाव में कई लड़कियाँ चरित्रहीन हो जाती है।

अगर माँ वेश्या होती है, तो पुत्री भी वेश्यावृत्ति अपनाती है। माता-पिता और अभिभावकों की दुश्चरित्रता और ढिलाई के कारण भी लड़के और लड़कियां निरंकुश होकर अनैतिक यौन-संबंध स्थापित करने लगते हैं। तलाक और सौतेले माता-पिता के दुर्व्यवहार के कारण भी अनेक कन्याएं वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर हुई है।

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अनैतिक पर्यावरण 

वेश्यावृत्ति और अनैतिक पर्यावरण में गहरा संबंध होता है। कई स्थानीय समुदायों, मुहल्लों, काम के स्थानों, अड़ोस-पड़ोस आदि में अनैतिक वातावरण छाया रहता है। इनमें गुडे, बदमाश और अन्य असामाजिक तत्व अपने-अपने अवैध धंधों में लगे रहते हैं।

कुछ स्थान शराब और अन्य नशीली वस्तुओं के व्यापक सेवन, तस्करी, सस्ते मनोरंजन आदि के लिए बदनाम रहते हैं। ऐसे वातावरण में लड़कियों को अपनी नैतिकता बनाए रखना कठिन होता है। अनैतिक वातावरण के प्रभाव में कई पुरुष भी आसानी से दुराचरण में लग जाते हैं।

टी0वी0, सिनेमा या सी0डी0 द्वारा अश्लील प्रदर्शनों तथा संपर्क माध्यमों में आए क्रांतिकारी परिवर्तनों के चलते यौन उत्तेजना, यौन अपराध, अनैतिक यौन-संबंध तथा वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता गया है।

प्रथाएँ एवं परंपराएँ 

कुछ धार्मिक और सामाजिक प्रथाओं एवं पंरपराओं से भी वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता रहा है। जैसा कि इस अध्याय में पहले कहा जा चुका है, दक्षिण भारत के मंदिरों में नृत्य और गान में कुशल लड़कियों को देवदासियों के रूप में धर्म को समर्पित किए जाने की प्रथा सदियों से चलती आ रही है।

कई हिन्दू-धर्मग्रंथों में इसे एक धार्मिक कृत्य समझा गया है। भारत के कई भागों में संतान के इच्छुक माता-पिता यह मनौती मानते आए है कि अगर कन्या का जन्म हुआ, तो वे उसे देवता को समर्पित कर देगे।

इन देवदासियों का नाम उन देवताओं के नाम पर रखा जाता था, जिन्हें उन्हें समर्पित किया जाता था। देवदासियों को देवताओं की विवाहिता समझा जाता था। देवदासियों का मुख्य कार्य नृत्य और गान के माध्यम से मंदिरों की शोभा बढ़ाना था। लेकिन, मंदिरों के पुजारी इन देवदासियों को यौन-संबंधों और वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य करने लगे।

कालक्रम से देवदासी प्रथा और भी कलुषित होती गई। अनेक माता-पिता धन के लोभ में भी अपनी लड़कियों को मंदिरों में समर्पित करने लगे। देश के अलग-अलग भागों में देवदासियों को अलग-अलग नामों से पुकारा जाता रहा है, जैसे-केरल में ‘कुदिकर, महाराष्ट्र में ‘मुरली’, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ‘वासवी’, ‘भाविन, ‘देवाली और नैकिन’, कर्नाटक में “जोगाथी’ तथा राजस्थान में ‘भगतिन’। सर्वेक्षणों में दिखाया गया है कि इनमें अधिकांश देवदासियाँ निर्धन हरिजन परिवारों की रही है।

लड़कियों को धर्म को समर्पित किए जाने की प्रथा केवल भारत में ही नहीं रही है। यूनान और रोम की पुरानी सभ्यताओं तथा मध्यकालीन युग में यूरोपीय देशों के गिरजाघरों में भी धर्म के नाम पर वेश्यावृत्ति को प्रचुर प्रोत्साहन मिला है।

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गिरजाघरों में साधुओं द्वारा साध्वियों के अनैतिक शोषण के अनेक उदाहरण मिलते हैं। कई पादरी सुंदरी कुमारियां को स्वर्ग के फाटक खोलने का साधन समझते थे। कई सर्वेक्षणों में दिखाया गया है कि वेश्यालयों में रहने वाली कई वेश्याएँ पहले गिरजाघरों में ही भ्रष्ट हो चुकी थी।

इन धार्मिक प्रथाओं के अतिरिक्त कुछ सामाजिक प्रथाओं के कारण भी वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता आया है। हिमालय क्षेत्र के कई भागों में ‘रीत’ प्रथा प्रचलित है।

इसमें पति को अपनी पत्नी को बेचकर नई पत्नी खरीदने का जनसमूहों में वेश्यावृत्ति परंपरा से चलती आई है। कुछ सामान्य सामाजिक कुप्रथाओं, जैसे-दहेज, बहुविवाह, अन्य विवाह, परिवीक्षाविवाह आदि के कारण भी अनैतिक यौन-संबंध और वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहन मिलता आ रहा है।

उद्योगीकरण और नगरीकरण

उद्योगीकरण तथा नगरीकरण भी वेश्यावृत्ति के महत्वपूर्ण कारक रहे है। जैस-जैसे उद्योगों और नगरों का विकास होता गया है, वैसे-वैसे बड़ी संख्या में लोग रोजी-रोटी के लिए गाँवों से औद्योगिक केन्द्रों और नगरों में चले जाते हैं।

उनके कई अपने परिवारों को गाँवों में ही ब्रेड़ देते हैं। शहरों और औद्योगिक केन्द्रों में आवासीय कठिनाइयों के कारण अनेक श्रमिक और कर्मचारी परिवारों से दूर अकेले जीवन व्यतीत करते हैं। कई छावनियों में सैनिक भी बड़ी संख्या में रहते हैं।

वाणिज्य-व्यापार, कार्यालय, परिवहन के साधनों, सेवाओं आदि के विस्तार से भी नगरों और औद्योगिक केन्द्रों में पुरुष-कर्मचारियों या स्वनियोजित व्यक्तियों की संख्या में व्यापक वृद्धि हुई है। इन सबके फलस्वरूप नगरों और औद्योगिक केन्द्रों में लिंग-अनुपात में व्यापक विषमता आ जाती है तथा स्त्रियों की तुलना में पुरूषों की संख्या बहुत अधिक हो जाती है।

परिवारों से दूर आकर रहनेवाले अनेक व्यक्तियों को यौन-संतुष्टि के लिए वेश्याओं के पास जाना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। इस प्रकार, नगरों और औद्योगिक केन्द्रों में वाणिज्यिक वेश्यावृत्ति व्यापक से चलती रहती है। श्रमिकों और कर्मचारियों के केन्द्रीकरण वाले क्षेत्रों में दूर-दूर, यहाँ तक कि विदेशों से वेश्याएँ आकर बस जाती है।

प्रवसन

विगत वर्षों में कई देशों से लड़कियों और युवतियाँ रोजगार या धन-अर्जन के लोभ में विदेश जाने लगी है। भारत में प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में लड़कियाँ रोजगार के लिए खाड़ी देशों, ग्रेट ब्रिटेन तथा अन्य देशों में जाती है। उनमें कई को व्यभिचार, अनुचित यौन-संबंध तथा अंततः वेश्यावृत्ति के लिए बाध्य किया जाता रहा है। इसी तरह, कई देशों से पुरूषों के अंतराष्ट्रीय प्रवसन में भी व्यापक वृद्धि होती गई है।

परिवार को स्वदेश में ही छोड़कर विदेशों में प्रवसन करने वाले पुरुषों से वेश्याओं की माँग को प्रोत्साहन मिलता रहा है। एक ही देश में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पुरूष या स्त्री श्रपिकों के प्रवसन से भी वेश्यावृत्ति की माँग और पूर्ति दोनों प्रभावित होती रही है।

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व्यापार के रूप में लाभदायक 

कई लोग वेश्यावृत्ति को लाभदायक व्यापार समझते हैं। कुछ देशों में इस व्यापार में अलग-अलग रूप में कई लोग होते हैं। वास्तव में, इस व्यवसाय का अधिकांश लाभ दलालों, वेश्यालयों के स्वामियों, कुटनियों, भडुओं, गुंडों और बदमाशों में बँट जाता है। वे विभिन्न तरीकों का सहारा लेकर वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों और स्त्रियों की आपूर्ति बनाए रखते हैं और ग्राहकों को लाते रहते हैं।

कभी-कभी इस व्यवसाय में अच्छी खासी रकम लगी होती है, जिसके कारण इसमें पूँजी लगानेवाले तथा व्यापार पर निर्भर लोग इसकी उन्नति और निरंतरता बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते हैं। वेश्यावृत्ति में अंतराष्ट्रीय व्यापार भी होते रहते हैं।

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