Bharat ka laddaakh itana mahatvapoorn kyon hai – लद्दाख इतना क्यों महत्वपूर्ण है India ko

Bharat ka laddaakh itana mahatvapoorn kyon hai – लद्दाख इतना क्यों महत्वपूर्ण  है India ko

Bharat ka laddaakh itana mahatvapoorn kyon hai - लद्दाख इतना क्यों महत्वपूर्ण  है India ko

Bharat ka laddaakh itana mahatvapoorn  kyon hai – लद्दाख इतना क्यों महत्वपूर्ण  है India ko और यह सब कुछ जो चाइना और इंडिया के बीच में हो रहा है वह क्यों हो रहा है
आज आप जानेंगे कि लद्दाख इतना महत्वपूर्ण भारत के लिए कैसे हैं और इसका क्या सदुपयोग भारत कर सकता है

वैसे तो मैं आपको बता दूं लद्दाख कितनी ऊंचाई पर है कि जहां पर सब्जियां तक नहीं हुआ जा सकती उस जमीन के लिए चाइना क्यों इंडिया से लड़ने को तैयार है
आज के इस लेख में आप जानेंगे की Bharat ka laddaakh itana mahatvapoorn kyon hai – लद्दाख इतना क्यों महत्वपूर्ण  है India ko क्योंकि यह इंडिया का हिस्सा है हमें से जानेेेेेे बिल्कुल नहीं  दे सकते

शिन्जियांग China का एक स्वायत्त क्षेत्र है और तिब्बत पर चीन की कब्जा पहले से ही था । ‘ चाइना पिक्टोरियल ‘ (China pictorial)  में चीन का यह नक्शा छपने के तुरंत बाद दोनों देशों के नेताओं के बीच लद्दाख के मुद्दे पर एक – दूसरे को लिखित संदेशों का आदान – प्रदान शुरू हो गया ।

तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (Prime Minister Jawaharlal Nehru )और चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एनलाई (Chinese Prime Minister Chow Enlai) के बीच पत्रों के आदान – प्रदान के बाद ही 1962 में Bharat – China युद्ध हुआ।

इस युद्ध का ही नतीजा रहा कि लद्दाख के साथ लगती सीमा पर ‘ अस्पष्ट रूप से चिन्हित नियंत्रण रेखा ‘ खींच दी गई , जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा ( एलएसी ) कहा जाता है ।

(Laddaakh )लद्दाख के विषय में अगस्त 1959 में लोकसभा में अपने वक्तव्य में नेहरू ने कहा था , ‘ पूर्वी और उत्तर – पूर्वी लद्दाख के बीच एक बहुत बड़ा क्षेत्र ऐसा है , जो वास्तव में निर्जन है और ‘ जहां घास का एक तिनका भी नहीं उगता ।

‘ उनका यह वक्तव्य काफी चर्चित हुआ था । राजनीति विज्ञानियों मारिट डब्ल्यू फिशर और लिओ ई . रोज ने 1962 में एक पत्र ‘ लद्दाख और चीन – भारत सीमा विवाद ‘ में लिखा है , ‘ वास्तव में यह सवाल उठाया जाना लाजमी है , उस वक्त कितने लोगों को पता होगा कि लद्दाख वास्तव में कहां स्थित है ? या शायद ही वे कभी लद्दाखियों की राष्ट्रीयता के विषय में दृढ़ता से कुछ कह पाए हों । ‘

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Bharat ka laddaakh  mahatvapoorn kyon hai – ऐतिहासिक महत्त्व 

भारत और चीन के लिए लद्दाख का महत्त्व उस जटिल ऐतिहासिक कदम से भी समझा जा सकता है , जिसकी वजह से लद्दाख जम्मू – कश्मीर का एक अंग माना गया और 1950 में तिब्बत पर अधिकार के बाद चीन भी लद्दाख को महत्वपूर्ण मानने लगा ।

वर्ष 1834 में डोगरा आक्रमण से पहले तक लद्दाख एक स्वतंत्र हिमालयी राज्य था । ऐतिहासिक व सांस्कृतिक रूप से लद्दाख स्वाभाविक तौर पर पड़ोसी तिब्बत से जुड़ा है ।

भाषा व धर्म लद्दाख और तिब्बत को आपस में जोड़ते हैं । राजनीतिक रूप से भी दोनों के इतिहास में समानता है ।

Bharat ka laddaakh  mahatvapoorn kyon hai – राजनीतिक महत्त्व

इतिहासकार जॉन ब्रे ने अपने शोध पत्र लद्दाखी इतिहास और भारतीय राष्ट्रवाद ‘ में लिखा है , लद्दाख तिब्बती साम्राज्य का ही एक अंग था ।

742 ईस्वी में राजा लंगडर्मा की हत्या के बाद यह तिब्बत से अलग होकर एक स्वतंत्र राज्य बन गया ।

हालांकि इतिहास के अलग अलग कालखंडों में इसकी सीमाओं में बदलाव आता रहा और कई बार इसका विस्तार मौजूदा पश्चिमी तिब्बत के एक बड़े हिस्से तक भी माना गया ।

आर्थिक महत्त्व / Bharat ka Ladakh Etana mahatvapoorn kyon hai China ke leya

ब्रे ने यह भी लिखा , ‘ इस क्षेत्र का आर्थिक महत्त्व इस तथ्य से स्पष्ट है कि यह मध्य एशिया और कश्मीर के बीच का प्रवेश द्वार है ।
तिब्बती पश्मीना शॉल व ऊन लद्दाख से लेकर कश्मीर तक लाया और ले जाया जाता है । साथ ही कराकोरम पास से यारकंद और काशगर से चीनी तुर्किस्तान तक एक समृद्ध व्यापार मार्ग है । ‘

सिखों ने 1819 में कश्मीर पर आधिपत्य कर लिया तो सम्राट रणजीत सिंह का अगला लक्ष्य लद्दाख हो गया । जम्मू में सिखों के डोगरा शासकों ने लद्दाख को ।

जम्मू – कश्मीर के साथ एकीकृत करने का कार्य किया । तब तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में पैर जमाने लगी थी ।

शुरुआत में इसने लद्दाख को महत्त्व नहीं दिया लेकिन कम्पनी क्षेत्र में डोगरा आधिपत्य से उत्साहित थी क्योंकि उसे उम्मीद थी कि इससे तिब्बती व्यवसाय के एक बड़े हिस्से पर उसका अधिकार हो जाएगा ।

इसके बाद 1834 में गुलाब सिंह ने इस क्षेत्र पर विजय पाने के लिए अपने सबसे योग्य जनरल जोरावर सिंह कहलुरिया : के नेतृत्व में चार हजार जवानों की सेना भेजी ।

इतिहासकार रॉबर्ट ए.हट्टनबैक ने अपने आलेख ‘ गुलाब सिह और जम्मू – कश्मीर व लद्दाख का निर्माण ‘ में लिखा है कि लद्दाख की ओर से शुरू में कोई विरोध नहीं हुआ क्योंकि वे इस घटनाक्रम पर चकित थे लेकिन 16 अगस्त 1834 को डोगराओं ने संकू में भोटिया नेता मंगल के नेतृत्व में करीब 5000 जवानों की सेना को परास्त कर दिया ।

इसके बाद लद्दाख पर डोगरा राज कायम हो गया । मई 1841 में चीन के किंग वंश के अधीन तिब्बत ने लद्दाख को चीन के अधिकार क्षेत्र में लाने की उम्मीद से उस पर आक्रमण किया , जो आगे चल कर चीनी सिख युद्ध में तब्दील हो गया ।

हालांकि इस युद्ध में चीनी तिब्बती सेना की हार हुई और चुलशुल की संधि पर हस्ताक्षर किए गए । इसमें तय किया गया कि पराये देश की सीमाओं पर अब और अतिक्रमण या दखलंदाजी नहीं की जाएगी ।

विशेषज्ञों के अनुसार , 1845-46 के युद्ध के बाद लद्दाख सहित जम्मू – कश्मीर राज्य ब्रिटिश , सिख साम्राज्य से मुक्त करवाकर अपने आधिपत्य में ले आए ।

जम्मू – कश्मीर राज्य का निर्माण ब्रिटिश शासन की देन है । उन्होंने इसका इस्तेमाल ऐसे बफर जोन के तौर पर किया , जहां वे रूसी लोगों से मिल सकें ।

इसी का नतीजा रहा कि लद्दाख के वास्तविक स्वरूप और जम्मू – कश्मीर के विस्तार को सीमित करने के प्रयास शुरू हो गए ।

परन्तु जब से यह क्षेत्र तिब्बत और मध्य एशिया के प्रभाव क्षेत्र में आया यह जटिल हो गया ।

यहां उल्लेखनीय है कि उस समय तक लोग इस बात को कोई खास महत्त्व नहीं देते थे कि वे किस देश के वासी हैं । इसलिए यह तर्क दिया जा सकता है कि नक्शा बनाते समय हो सकता है ब्रिटिश कुछ आगे के इलाके तक अतिक्रमण कर गए हों ।

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी किताब ‘ इंडिया आफ्टर गांधी ‘ में लिखा है कि भारतीयों का मानना है कि अधिकांश भाग के लिए सीमा का अंकन या पहचान संधि और पारंपरिक आधार पर किया गया।

चीन का कहना है कि वास्तविक रूप से सीमांकन हुआ ही नहीं दोनों सरकारों के दावे का आधार उनकी हुकूमत से प्रेरित रहा है भारत का ब्रिटिश से तो चीन का तिब्बत पर चीन के राज से